थाना सरसीवां

      जनश्रुतियो के अनुसार सरसीवां का पूर्व नाम सिरसागढ था और मलखान यहां का राजा था इस बात की पुष्टि भोलाकृत आल्हा से होती है जिसमे सिरसागढ में सरसीवां का गांव का स्पष्ट उल्लेख है लेकिन विडंबना है कि उक्त पुस्तक के सिवाय आज तक अन्य कोइ्र्र साक्ष्य नही मिला है उसी वजह से लोग आज सरसीवां का नामकरण इस क्षेत्र में सरसीवां वृत जिसे स्थानीय लोग करही भी कहते है और यह भी सच है कि सैकडो साल पहले यहां सरसीवा वृक्ष सीना ताने खडे हुए थे । अतः सरसीवां वृक्ष के नाम पर सरसीवां गांव का नामकरण समिचिन है।

     आज से साढे तीन सौ साल पुर्व यह गांव संबलपुर नरेश महाराजा चैहान के अधीन था, उस समय वरिष्ठ पत्रकार एवं सत्य कथा लेखक गणेशराम दुबे के पूर्वज प्रहलाद राय दुबे संबलपुर महाराजा के दीवान थें प्रहलाद राय के पुत्र हरवंश दुबे ने महाराजा चैहान से 1930 रूपये नजराना देकर सरसीवां को खरीदा था उसके बाद वे लोग यहां आकर बस गये। और जंगलो को साफ कर खेतीबाडी करने लगे ये लोग यहां के मालगुजार थे और संबलपुर राजा को कर पटाते थें।

    तबसे यह गांव सरसीवां संबलपुर जिले के अधीन था। सन 1865 मे सर रिचर्ड टेम्पल के प्रतिवेदन के आधार पर सरसीवां को बिलासपुर जिले में सम्मिलित कर लिया गया। सन 1906 मे जब दूर्ग जिले का गठन हुआ तब सरसीवां का समावेशकर रायपुर जिले मे कर दिया गया लेकिन रायपुर जिले से पृथक होने पर बलौदाबाजार जिला के अंतर्गत आता है।

    सरसीवां के उत्तर दिशा में चित्रोत्पला महानदी कल कल के साथ बह रहा है तो दक्षिण में गाताडिह का पहाड सुशाभित है। पूर्व मे लैलह नाला है तो पश्चिम में गिरसानाला बहती है इसन सब के बिच सरसीवां सिरमौर की तरह है।

    सरसीवां की महामहाया देवी इस अंचल की प्रमुख आराध्य देवी है जिनको आज से साढे चार सौ साल पूर्व संबलपुर के राजा चैहाण द्वारा बनवाया गया था।

    यहां पर सन 1964 से थाना कायम हुआ पूर्व में यह बिलाईगढ थाना के अंतर्गत आता था, परंतु सरकारी थाना भवन क अभाव में थाना बस्ती में श्री गोपीकिशन अग्रवाल की धर्मशाला में लगता था। शासन द्वारा नया थाना भवन बनवाया गया है जिसे दिनांक 10.10.1975 को लोकनिर्माण विभाग से कब्जे से लिया गया दिनांक 22.02.1976 से नये थाना भवन मे कार्य सुचारू रूप से किया गया जिसका उदघाटन अ.भू. भटटाचार्य (आईपीएस) पुलिस अधीक्षक रायपुर के करकमलो में थाना सरसीवां का उदघाटन दिनांक 27.02.1976 को किया गया.

    यहां पर सतनामी जाति की बहुल्यता पाई जाती है तथा साहु, कुर्मी, मरार, ब्राम्हण, आदिवासी, धोबी एवं अन्य जाति के लोग भी निवासरत है। सतनामी जाति के लोग काफी गरीब तबके के है सिंचाई का साधन नही होने से काम धंधा, मजदुरी करने अलग अलग राज्य चले जाते है।

    थाना सरसीवां जिला मुख्यालय के पुर्व दिशा में स्थित है जो भाटापारा सारंगढ मार्ग मुख्य मार्ग पर स्थित है। थाना सरसीवां तीन जिलों का संगम है उत्तर में जांजगीर चांपा, दक्षिण में महासमुंद एवं पूर्व में रायगढ जिलो के गांव को छुता है।

    थाना सरसीवां में 12 किलोमीटर दुर ग्राम जैतपुर के पास एक शिवमंदिर स्थित है जहां लोग सावन माह में महानदीसे जल लेकर शिवमंदिर मंे जल अभिषेक करते है तथा मकर सक्रांति के दिन उक्त मंदिर में मेला लगता है, ग्राम सरसीवां में महामाया मंदिर प्राचीन काल से है जहां नवरात्रि मे ज्योत प्रज्जवलित किये जाते है।

    थाना सरसीवां विधानसभा बिलाईगढ क्षेत्र के अंतर्गत आता है यहां एक सरकारी अस्पताल है।

    थाने का विस्तार 514 वर्ग किमी है थाना का कुल 2.022 हेक्टेयर है 0.093 हेक्टेयर मे थाना भवन, 0.072 हेक्टेयर मे आवासगृह, 4.59 एकड में थाना रिजर्व भवन, 0.41 एकड में थाना भवन आवास गृह शिवमंदिर बना है। थाना क्षेत्र में 94 गांव जिसमें चैकी बेलादुला में 30 गांव एवं थाना सरसीवां में 64 गांव आते है।

    थाना सरसीवां में 01 निरीक्षक, 02 उपनिरीक्षक, 04 सउनि, 04 प्रधान आरक्षक, 48 आरक्षक स्वीकृत बल है जिसमें वर्तमान में थाना सरसीवां में 01 निरीक्षक, 01 उपनिरीक्षक, 01 प्रशिक्षु उपनिरीक्षक, 04 सउनि, 04 प्रधान आरक्षक, एवं 44 आरक्षक पदस्थ है एवं चौकी बेलादुला में 01 सउनि, 02 प्रधान आरक्षक एवं 14 आरक्षक पदस्थ है।