थाना कसडोल

      कसडोल की ऐतिहासिक गाथा पुरातन एवं समृध्द है इसका अस्तित्व 16 वी शताब्दी से मिलता है यह हैहय वंशीय राजा के राज्याधीन था, जिसकी राजधानी रतनपुर बिलासपुर थी, राजा ने धार्मिक अनुष्ठानों के संपादन के लिए उत्तरी भारत के ग्राम पयासी जिला बलिया से पलटु मिश्र को रतनपुर लाये तत्समय ही उन्हे 84 गांव का पटटा दिया गया कसडोल जमीदारी के 32 गांव भी उन्ही 84 गावों में शामिल थे।सन 1745 में रतनपुर में मराठों के सत्तासीन होने पर लवन के पीला साव 750 गांवो की ताहुतदारी दी गईजिससे यह लवन राज कहलाया, बाद में कर्नल अग्ने से मतभेद हो जाने पर ताहुतदारी खत्म हुई। मराठो ने कटगी कीर जमीदारी गुमानसिंह को सोनाखान की जमीदारी रामराय को देवरी की जमीदारी महाराज राय को 1800 ई. में दी। अग्रेज विरोधी रामराय के पुत्र नारायण सिंह द्वारा सन 1857 की गदर में अग्रेजो के विरूध्द खुला युध्द घोषित करने से जमीदारी समाप्त कर दी गयी। सन 1859 में आरंग के सरजु प्रसाद अग्रवाल को लवन के 13 गांव अल्प किमत में दे दिये गये। पलटु मिश्र की छठवी पीढी के विशेषर मिश्र, भुवनेश्वर मिश्र सन 1860 मे रतनपुर से कसडोल में बस गये। कसडोल एवं 28 गांव शिवदत्त मिश्र का दिये गये। रतनपुर दीवान के दामाद निहाल मिश्र कसडोल आये। सन 1875 मे कटगी जमीदार की निःसंतान मृत्यु होने पर जमीदारी बिलाईगढ जमीदार भोगसिंह के अधीन हुई। हैहय वंशीय महलो क अवशेष आज भी कसडोल एवं लवन में मिलते है जनवरी 1906 तक लवन बलौदाबाजार थाना का आउटपोस्ट तथा कसडोल इनका अ श्रेणी का ग्राम था। कटगी, शिवरीनारायण थाना आउटपोस्ट रहा। बिलासपुर जिले के सीमा छरछेद तक थी। अक्टुबर 1908 में कसडोल थाना अस्तित्व मे आया इसकी इमारत स्व. बृजलाल मिश्र ने उसी सन में बनवाई थी।

     थाना क्षेत्र की उत्तरी सीमा शिवनाथ नदी बहती है साथ हि महानदी, जोकनदी, बामलदेही नदी क्षेत्र में बहती है। थाना से 25 किमी दक्षिण पूर्व में दर्शनीय गौमुखी तुरतुरिया जल प्रपात है यहां 08 वी -09 वी शताब्दी की बौध्द कालीन मुर्तिया है एैसी मान्यता है कि महर्षि वाल्मिकी आश्रम यही था लव कुश की जन्म स्थली है, भगवान रामके द्वितीय पुत्र कुश से जोडकर इस गांव व क्षेत्र का प्राचीन नाम कुशदोल होना बताते है जो अपभ्रंश होकर कसडोल हुआ। 09 किलोमीटर दक्षिण में नारायणपुर में शिव का प्राचीन मंदिर है जिसे पुरातन विभाग से अधिग्रहित किया है।